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शेयर बाजार : नकदी ज्यादा या कम ?

पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं बैंकिंग विषयों का विशेषज्ञ नहीं, लेकिन कुछ बातें मेरी सामान्य बुद्धि में भी नहीं समा रहीं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के रुख ने मेरे मन में उलझन पैदा कर दी है कि बाजार में पैसा कम या ज्यादा होने के बारे में आरबीआई भला सोच क्या रहा है।
हमें पता है कि हाल में मौद्रिक और कर्ज नीति में आरबीआई ने सीआरआर (कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात) को 0.75% बढ़ाया, ताकि बैंकिंग व्यवस्था से करीब 27,000 करोड़ रुपये की नकदी हट जाये। यानी आरबीआई ने यह मान कर चल रहा था कि बैंकिंग व्यवस्था में यह नकदी अतिरिक्त है और इसके चलते मुद्रास्फीति यानी पैसे का अधिक प्रसार (जिसे हम सामान्य बोलचाल में महंगाई दर कहने लगे हैं) की स्थिति बन रही है।
लेकिन इस कदम का एक नतीजा हमने अभी-अभी इसी हफ्ते देखा, जब भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को आरबीआई से 7.75% रेपो दर पर 13,000 करोड़ रुपये की उधारी लेनी पड़ी। हालांकि इसकी फौरी वजह सरकारी तेल कंपनियों की ओर से काफी ज्यादा उधारी लिये जाने की संभावना थी, लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि बैंकिंग व्यवस्था में अब फालतू नकदी की स्थिति नहीं रह गयी है। ऊंची ब्याज दरों की वजह से कर्ज लेना आम लोगों और कंपनियों, दोनों के लिए मुश्किल हो चला है।
और इन स्थितियों में आरबीआई ने कंपनियों को विदेशी कर्ज (ईसीबी) जुटाने के मामले में राहत देने का फैसला किया है। दूसरी ओर सेबी ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को सब-एकाउंट और पी-नोट के बारे में कुछ ढील दी है। आरबीआई और सेबी, दोनों के इन कदमों का मकसद यही दिखता है कि डॉलर फिर से भारत की ओर आकर्षित हो। हाल में रुपया डॉलर की तुलना में काफी फिसला है। एफआईआई बिकवाली ने रुपये की कमजोरी को बढ़ाया है। सबसे ज्यादा चोट इसलिए महसूस हो रही है कि कच्चे तेल के भाव वैसे ही आसमान पर हैं, और रुपये की कमजोरी के चलते तेल आयात के इस बोझ को और बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर आरबीआई को फिर से डॉलर आकर्षित करने की जरूरत महसूस होने लगी है, जबकि कुछ समय पहले वह हद से ज्यादा डॉलर आने को लेकर परेशान था।
लेकिन उलझन यही है कि आप बाजार में नकदी बढ़ाना चाह रहे हैं, या घटाना। अगर आप मान रहे हैं कि नकदी कम पड़ रही है तो सीआरआर घटायें। अगर आप मान रहे हैं कि कंपनियों को कर्ज लेने में मुश्किल हो रही है तो घरेलू ब्याज दरें घटायें। पर ऐसे संकेत दिख तो नहीं रहे।

राजीव रंजन झा

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