दरअसल हाल में जब सीआरआर बढ़ाया गया, तभी से विश्लेषकों का एक तबका मान रहा है कि आरबीआई जब तक इसका असर नहीं देख लेता, तब तक शायद वह अगला कदम न उठाये, यानी ब्याज दर तब तक न बढ़ाये। दूसरे, भले ही महंगाई दर को नियंत्रण में रखने का दबाव काफी ज्यादा है, लेकिन दूसरी ओर ब्याज दरें अब इन ऊंचे स्तरों से भी और ऊपर ले जाने के खिलाफ दबाव कम नहीं हैं। सबसे पहला दबाव तो विश्व अर्थव्यवस्था का ही है। हाल के महीनों में अमेरिकी ब्याज दरों और भारतीय ब्याज दरों का ग्राफ उल्टा चला है। 30 अप्रैल को ही फेडरल रिजर्व की बैठक होने वाली है। क्या पता वहां एक बार फिर दरों में कटौती हो जाये, हालांकि वहां ब्याज दरें इतनी नीचे आ चुकी हैं कि बेन बर्नांके के पास ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। आरबीआई अंतरराष्ट्रीय रुझान से एक सीमा तक ही उल्टे चल सकता है, और वह सीमा दूर नहीं है।
दूसरे, उद्योगों की ओर से त्राहिमाम संदेश तेज होता जा रहा है। फिक्की ने इसी शनिवार को बिजनेस कॉन्फिडेंस सर्वे जारी किया है, जिसमें 50% कंपनियों ने कहा है कि पिछले छह महीनों के दौरान आर्थिक दशाएं बिगड़ी हैं। फिक्की के पिछले सर्वे में ऐसा मानने वाली कंपनियों की संख्या केवल 19% थी। आर्थिक दशाएं बिगड़ने की जो वजहें गिनायी गयी हैं, उनमें सबसे पहला स्थान है ऊंची ब्याज दरों का। साथ ही रुपये की मजबूती और कच्चे माल की बढ़ती लागत को कसूरवार ठहराया गया है। दरअसल ये तीनों ही बातें आपस में इस कदर गुंथी हैं कि उस चक्रव्यूह से निकलने का कोई सीधा रास्ता न तो सरकार को दिख रहा है, न ही आरबीआई को। लेकिन यह धारणा बड़ी तेजी से मजबूत हो रही है कि अब ब्याज दरें और बढ़ाना इस समस्या का हल कतई नहीं है।
राजीव रंजन झा
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