रबी की फसल के बाजारों में आने का समय हो चुका है। अगर अच्छे मानसून से खरीफ की फसल भी अच्छी होने की उम्मीद बंधती है, तो निश्चित रूप से इसका असर कीमतों पर दिखेगा। सरकार की यह उम्मीद भी गैर-वाजिब नहीं है कि खाद्य तेलों पर शुल्क घटाये जाने का असर अब बाजार में दिखना चाहिए। लेकिन इन सबसे मिलने वाली राहत फौरी ही होगी। खुद सरकार को भी यह मालूम है कि भारतीय कृषि की असली समस्या उत्पादन का लगभग रुक जाना है। उत्पादन में इस ठहराव की वजह यही है कि कृषि में लगे तबके के पास नये निवेश की क्षमता नहीं है। जिनके पास क्षमता है वे भी फायदेमंद नहीं रह गयी खेती में पैसा लगाना नहीं चाहते। इस समय वही लोग मजबूरी में खेती कर रहे हैं, जो कुछ और नहीं कर सकते। इस स्थिति में कृषि में पूंजी निवेश रुक चुका है।
खेती में किसानों की दिलचस्पी तभी लौट सकती है, जब उन्हें अपनी फसल की अच्छी कीमत मिले। लेकिन मौजूदा वितरण व्यवस्था को सुधारे बिना किसानों को तभी ज्यादा दाम मिल सकते हैं, जब ग्राहक की जेब से ज्यादा पैसे निकलें, यानी और ज्यादा महंगाई। ऐसा रास्ता निकालना होगा कि ग्राहक की जेब पर तो बोझ न बढ़े, लेकिन किसान तक ज्यादा पैसे आयें। इसके साथ ही खेतों की उत्पादकता बढ़ानी जरूरी है। पहले हरित क्रांति ने भारत को अन्न संकट से उबारा था, लेकिन अब उसकी सीमाएं भी सामने आ चुकी हैं।
जब तक इन सब बातों को ध्यान में रख कर व्यापक रणनीति नहीं बनायी जाती, तब तक चाहे किसान हों, या सरकार, सबको इंद्र देव का ही आसरा रहेगा। बतौर निवेशक आप भी थोड़ी प्रार्थना कर लें!
राजीव रंजन झा
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