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शेयर बाजार - ऑर्किड: अधिग्रहण की कोशिश नहीं?

कल जैसे ही रैनबैक्सी के प्रवक्ता की ओर से यह टिप्पणी आयी कि रैनबैक्सी जबरिया अधिग्रहण में यकीन नहीं करती, ऑर्किड के शेयर भावों में आया उबाल एकदम से ठंडा पड़ गया। इस एक वाक्य के बयान से बाजार ने शायद यही संकेत लिया कि रैनबैक्सी समूह की ओर से ऑर्किड केमिकल्स के और ज्यादा शेयर खरीदने और उसके बाद ओपन ऑफर लाये जाने की संभावना कम हो गयी है।
चलिये, अगर इस बात पर यकीन कर भी लें कि रैनबैक्सी ऑर्किड केमिकल्स के जबरिया अधिग्रहण की कोशिश में नहीं लगी है, तो भी कई सवाल अनसुलझे हैं। पहली बात तो यही कि रैनबैक्सी ने केवल जबरिया अधिग्रहण से इन्कार किया है। ऑर्किड को हासिल करने की मंशा से इन्कार नहीं किया गया है, इकरार भी नहीं है। लेकिन अगर ऐसी मंशा नहीं है तो ऑर्किड 11.87% शेयर किस मकसद से खरीदे गये हैं?
मीडिया में सूत्रों के हवाले से आने वाली खबरें कह रही हैं कि शायद बातचीत के जरिये अधिग्रहण या रणनीतिक तालमेल की कोशिश की जायेगी। लेकिन जो भी स्थिति हो, रैनबैक्सी को अपने निवेशकों को उसके बारे में साफ-साफ बताना चाहिए। लेकिन रैनबैक्सी आधिकारिक रूप से इतना भी नहीं बता रही कि ऑर्किड के 11.87% शेयर खरीदने वाली कंपनी सोलरेक्स फार्मास्युटिकल्स रैनबैक्सी समूह की कंपनी है या नहीं।
इकोनॉमिक टाइम्स में इस बारे में आज छपी खबर की सुर्खी कह रही है कि रैनबैक्सी जरूरत के समय ऑर्किड के लिए दोस्त की भूमिका निभाना चाहती है। हालांकि इस सुर्खी को खबर के अंदर कहीं समझाया नहीं गया है कि भला किस तरह। लेकिन जो घटनाक्रम है, उसे देख कर कोई खुद ही अनुमान लगा सकता है। पहले रैनबैक्सी समूह की ब्रोकिंग कंपनी मार्जिन कॉल का दबाव उभरने पर ऑर्किड में प्रमोटरों की हिस्सेदारी बेच देती है जिससे भाव एकदम से टूट जाते हैं। उसके बाद रैनबैक्सी समूह की ही कोई और कंपनी नीचे आ चुके भावों पर बाजार से ऑर्किड के शेयर खरीद लेती है। शायद इसे ही दोस्ती निभाना कहते हैं!

राजीव रंजन झा

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