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सरकार बनाम उद्योग : तार को इतना न खींचो

कभी-कभी लगता है कि सरकार भी कितने विरोधाभासों के बीच चला करती है। महंगाई के मुद्दे पर सरकार की उलझनों को ही देखिये। अगर महंगाई पर काबू पाने के लिए अलग-अलग उद्योगों को मनाये, मनुहार करे, न मानें तो डंडा दिखाये और इन सब की वजह से खुले बाजार की बुनियादी सोच से अलग हटने की तोहमत झेले। अगर वह ये सब बातें न करे, तो आप ही कहेंगे कि कैसी निकम्मी सरकार है जो महंगाई इतनी बढ़ जाने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
अब इस खेल के दूसरे पात्रों को देखें। सीमेंट क्षेत्र के साथ सरकार की रस्साकशी काफी पुरानी हो चली है। अब इस्पात क्षेत्र भी उसी खेल का हिस्सा बन गया है। एक दिन अखबारों की सुर्खियां बनती हैं कि सीमेंट क्षेत्र कीमतें न बढ़ाने के लिए तैयार हो गया है। अगले ही दिन खबर आती है कि वास्तव में सीमेंट कंपनियों ने अपनी कीमतें 4% बढ़ा ली हैं।
इस मामले में सबसे पहला बुनियादी सवाल तो यही है कि क्या एक खुले बाजार में सरकार को कीमतों के मामले में दखल देनी चाहिए? अगर सरकार ऐसा करती है तो क्या यह फिर से मूल्य-नियंत्रण वाले दौर में वापस लौट जाने जैसा नहीं होगा? ज्यादातर लोगों को यही लग रहा है कि चुनावी साल होने के चलते सरकार ने महंगाई रोकने को ही सबसे पहली प्राथमिकता बना लिया है और इसके लिए आर्थिक सुधारों से दो कदम पीछे जाने में भी उसे परहेज नहीं है। लेकिन हम यह बात क्यों भूल रहे हैं कि महंगाई दर 5 सालों के सबसे ऊंचे स्तर पर है। सुधारवादियों को क्या यह भी याद दिलाना होगा कि ज्यादा ऊंची महंगाई दर अंततः आर्थिक विकास दर को ही धीमा कर सकती है।
बेशक, जब यह सुनने को मिलता है कि सरकार ने इस्पात क्षेत्र को कीमतें 10-20% घटाने की चेतावनी दी है, तो लगता है कि कहीं यह तुगलकी फरमान जैसा तो नहीं। लेकिन कीमतें घटाने की सरकारी अपील पर एकदम असहयोगी रवैया अपना कर भी इस्पात क्षेत्र न तो अर्थव्यवस्था का और न अपना कोई भला करेंगे। अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो उसका नतीजा विकास दर घटने के रूप में सामने आयेगा। उसके नतीजे इन कंपनियों के लिए भी तकलीफ देने वाले होंगे। अभी जिस लहलहाती मांग के चलते वे कोई भी कीमत वसूल कर पा रहे हैं, कहीं वही धारा सूख गयी तो?

राजीव रंजन झा

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