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• शेयर बाजार : कौन हैं बिकवाल?

बाजार में हाल की गिरावट का सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन है? इस सवाल पर एक झटके में आपको ख्याल आयेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार के माहौल का और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली का। लेकिन ताजा आंकड़े कहते हैं कि कम-से-कम मार्च महीने के उतार-चढ़ाव के लिए एफआईआई को कसूरवार ठहराना ठीक नहीं। मार्च महीने में सेंसेक्स 17,579 से उतर कर 15,644 पर आ गया, यानी महीने भर में 1935 अंक या 11% नीचे। अब इतनी बड़ी गिरावट अगर एफआईआई बिकवाली की वजह से हो, तो एफआईआई की बिकवाली भी काफी बड़ी होनी चाहिए थी। लेकिन आपको जान कर हैरत होगी कि मार्च महीने में सेंसेक्स में इस 11% गिरावट के बावजूद एफआईआई ने 124.40 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी ही की।

और देखिये, 31 मार्च को सेंसेक्स ने 727 अंक का गोता लगाया। लेकिन इस दिन एफआईआई ने कुल मिलाकर 10.80 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी ही की थी। यह ठीक है कि मार्च महीने में 124.40 करोड़ रुपये या 31 मार्च को 10.80 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी बेहद मामूली रकम है। लेकिन इतना तो है कि बाजार पर बिकवाली का दबाव एफआईआई की ओर से नहीं था। जाहिर है कि यह दबाव बाजार के दूसरे कोनों से आया। यह कहानी केवल मार्च की नहीं है। फरवरी में एफआईआई ने करीब 5420 करोड़ रुपये यानी लगभग 1.35 अरब डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। यह आंकड़ा तो हरगिज मामूली नहीं कहा जा सकता। एफआईआई की ओर से जबरदस्त बिकवाली दरअसल जनवरी के अंतिम दो हफ्तों में ही आयी थी, जिसके चलते साल के पहले महीने में उनकी ओर से 17,227 करोड़ रुपये यानी करीब 4.3 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली रही। इसका मतलब यह है कि जनवरी के केवल दो हफ्तों के दौरान जो बिकवाली आयी थी, उसका खुमार पिछले दो महीनों में भी बाजार से नहीं उतरा है।
इस बीच घरेलू म्यूचुअल फंड क्या कर रहे हैं? सेबी के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि मार्च महीने में उनकी ओर से कुल मिलाकर 1847.80 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की गयी है। जाहिर है कि मार्च में सेंसेक्स की 11% गिरावट के साथ इस आंकड़े का तालमेल बैठता है। इससे पहले फरवरी में म्यूचुअल फंडों ने 513.90 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की थी और जनवरी में उन्होंने बाजार को 7702.50 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी का सहारा दिया था। बड़ी दिलचस्प स्थिति है। जब बेहद ऊंचे स्तरों पर एफआईआई ने एकदम से दो हफ्तों के अंदर जबरदस्त बिकवाली की, उस समय तो घरेलू म्यूचुअल फंड उनके बेचे हुए शेयरों को अपनी झोली में डालते रहे। इस बिकवाली से सेंसेक्स 16 जनवरी से 31 जनवरी के दौरान 20,251 से फिसल कर 17,649 पर आ गया। तकरीबन उन्हीं स्तरों पर टिके रहने के दौरान फरवरी में भी म्यूचुअल फंडों ने खरीदारी की। लेकिन जब बाजार मार्च में टूटा, तो उनका हौसला भी टूट गया।
ताज्जुब है कि 20,000 से 17,000 की फिसलन के बीच खरीदारी करने वाले म्यूचुअल फंड 15,000 के स्तरों पर बिकवाल क्यों बने रहे। यह सवाल इसलिए भी ज्यादा चौंकाता है कि ज्यादातर म्यूचुअल फंड अच्छी खासी नकदी लिये बैठे हैं। क्या उन्हें घरेलू बाजार के बारे में कुछ ऐसा पता है, जो आम निवेशकों की नजरों से अभी ओझल है? या फिर, विदेशी निवेशक वाकई उनसे ज्यादा चतुर निकले हैं?

राजीव रंजन झा

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