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• भारत का जगुआर, भारत का लैंड रोवर

टाटा समूह ने भारत को गर्व का एक और क्षण दे दिया है। टाटा ने कोरस के अधिग्रहण के बाद बड़े सफल ढंग से उसे अपने कारोबार में शामिल किया और अपने बही-खातों पर इस अधिग्रहण का सकारात्मक असर बाजार की उम्मीदों से काफी पहले दिखा दिया। यह बात उम्मीद जगाती है कि शायद जगुआर और लैंड रोवर के अधिग्रहण के बाद इन शानदार अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के साथ भी टाटा समूह ऐसा ही कुछ कर पाये।
कोरस मामले में यह दिखा कि एक भारतीय कंपनी ने अपने से बड़ी विदेशी कंपनी को खरीदा, उसके कामकाज को बखूबी अपने मौजूदा कारोबार के साथ मिलाया और इस तालमेल के फायदों के बाजार की उम्मीदों से काफी पहले बही-खातों में ला दिया। दरअसल इस बात ने टाटा समूह को जगुआर-लैंड रोवर खरीद के लिए रकम जुटाने में बड़ी मदद की होगी। अंतरराष्ट्रीय कर्ज बाजार के इस मुश्किल समय में कर्ज बड़ा दुर्लभ और कीमती हो चला है। लेकिन अपनी साख की वजह से ही टाटा समूह ने आसानी से इस सौदे के लिए रकम जुटा ली। कोरस सौदे ने इस साख को अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी बढ़ाया है।
ब्रिटेन के अखबार इंडिपेंडेंट की सुर्खी कहती है, टाटा ने फोर्ड के लक्जरी नगीनों को केवल 2.3 अरब डॉलर में खरीदा। इस सुर्खी का ‘केवल’ शब्द बताता है कि टाटा समूह ने इस सौदे में मोल-भाव अच्छे से किया है। लेकिन क्या टाटा स्टील और कोरस की कहानी को टाटा मोटर्स भी जगुआर और लैंड रोवर खरीद में दोहरा सकेगी? फोर्ड जिन ब्रांडों से किसी तरह छुटकारा पाना चाहती थी, वे टाटा मोटर्स को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कितनी जगह दिला सकेंगे?
यह खरीद टाटा मोटर्स को लक्जरी कारों की श्रेणी में ला तो देगी, लेकिन इस श्रेणी में जगुआर और लैंड रोवर को तकनीक के मामले में मर्सिडीज, बीएमडब्लू और ऑडी जैसे प्रतिस्पर्धियों से पीछे माना जाता है। दोनों ब्रांडों की बिक्री बीते सालों में लगातार घटती गयी है। इनकी खरीद को कारोबारी तौर पर सफल बनाना टाटा समूह के लिए कोरस से ज्यादा चुनौती भरा होगा। लेकिन जहां चुनौतियां होती हैं, वहीं तो मौके भी होते हैं।

राजीव रंजन झा

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