मूल्यांकन सस्ते हो चुके हैं, इस बात से बहुत कम लोगों को इन्कार होगा। लेकिन उनका कहना यही है कि बाजार किसी नयी तेजी के लिए तैयार नहीं है और बिकवाली के दबाव से इसका फिसलना जारी रह सकता है। आगे बिकवाली थमे भी तो तुरंत कोई नया उत्साह नहीं जगेगा।
बहुत मुमकिन है कि अगले एक साल के दौरान हमें ऐसे बहुत से मौके दिखायी दें जब बाजार सस्ते मूल्यांकनों के बावजूद खरीदारी के लिए तैयार न हो। यह एक अतिरेक की स्थिति होगी। साल 2002 और 2003 को बीते अभी बहुत वक्त नहीं हुआ है, जब सेंसेक्स ने 2828 और 2904 जैसे स्तर दिखाये थे। साल 2002 के 12 महीनों में सेंसेक्स बस 2828 से 3758 के दायरे में नजर आया था। उस दौरान इसका पीई अनुपात (बीते 12 महीनों के हिसाब से) करीब 15 पर अटका था। आज अगर आप खुद से पूछें कि वह बाजार के लिए बहुत बुरा समय था, या खरीदारी का बहुत अच्छा समय था, तो क्या जवाब मिलेगा? बेशक, उस समय भी दबाव का दौर लंबा था। उस स्थिति के पलटने की बारी कब आयेगी, यह अनुमान लगाना उस वक्त किसी के लिए संभव नहीं था। सेंसेक्स का 20,000 के ऊपर जाना उस समय लोगों की कल्पना से भी परे था।
जिनके पास एकमुश्त नकदी पड़ी होती है, उनके लिए तो अच्छा यही रहता है कि संकट का कोई क्षण आये जब वे निवेश कर लें और उसके बाद बाजार संभल जाये। लेकिन कमा कर निवेश करते रहने वालों के लिए दबाव की लंबी अवधि ज्यादा अच्छी साबित हो सकती है।
राजीव रंजन झा
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