यह डर अस्वाभाविक नहीं है। ऐसी तमाम बातें इस बीच सामने आयी हैं, जो भविष्य की उम्मीदों को कमजोर कर रही हैं। सबसे अहम पहलू यह है कि जिस विकास दर को लेकर भारतीय बाजार की उम्मीदें सबसे ज्यादा टिकी रही हैं, उसको लेकर ही अंदेशे पैदा होने लगे हैं। लेकिन अभी तक मुझे एक भी ऐसी टिप्पणी का इंतजार है, जिसमें कहा गया हो कि 2008-09 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 8% से कम रहने वाली है। जब तक विकास दर 8% के ऊपर टिकी रहती है, भारतीय कंपनियों की आय को लेकर चिंता सीमित ही रहेगी।
बाजार के डर का एक बड़ा कारण खरीदारों का बाजार से हट जाना है। यह सही है कि बाजार कभी अपने वाजिब मूल्यांकन पर नहीं चलता। जब सेंसेक्स 22,000 के स्तरों पर था, तब मूल्यांकन ऊंचे बताये जा रहे थे। लेकिन फिर भी खरीदारी जारों पर थी। इस समय मूल्यांकन बेहद सस्ते माने जा रहे हैं। फिर भी खरीदार गायब हैं। बाजार का पेंडुलम कभी स्थिर नहीं हो सकता, और जब तक वह चल रहा है, अपनी चरम सीमा की ओर ही बढ़ने की कोशिश करेगा। यानी तेजी और मंदी, दोनों ही दौर में बाजार अपने चरम को छूने की कोशिश करता है। लेकिन एक सीमा के बाद उसे पलटना ही पड़ता है। यह सीमा कहां होगी, यही सबके कयास का विषय होता है।
लेकिन इस उलटफेर में अक्सर सयाने निवेशक और कारोबारी भी लुटते -पिटते हैं। फिलहाल, वही बात याद दिलाना चाहूंगा जो मैं अक्सर कहता हूं। बाजार में घबराहट की चरम स्थिति ही आपके लिए सबसे बड़ा मौका होती है। शायद वैसी स्थिति नजदीक है, तैयार रहें।
राजीव रंजन झा
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