केवल 5.3% बढ़त औद्योगिक उत्पादन में, बाजार के दुलारे-सितारे कैपिटल गुड्स क्षेत्र के बढ़ने की रफ्तार केवल 2.1% पर, और कंज्यूमर ड्यूरेबल क्षेत्र में बढ़त छोड़ उल्टे 3.1% की गिरावट। क्या भारत के विकास की यही नयी तस्वीर है? जनवरी 2008 के जो ताजा आंकड़े आये हैं, वे तो यही बता रहे हैं।
एक फौरी प्रतिक्रिया यह उभर रही है कि अरे, इतनी कम दरें नहीं हो सकतीं, कहीं कुछ रह गया होगा, शायद आंकड़े पूरे नहीं आये होंगे। बहुत संभव है है कि अगले महीने स्थिति फिर संभली हुई नजर आये और हमारी उम्मीद भी यही होगी। लेकिन ये ऐसे संकेत हैं, जिन्हें वित्त मंत्री और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई वी रेड्डी नजरअंदाज नहीं कर सकते।
अगर हम कैपिटल गुड्स क्षेत्र की 2.1% की बेहद निराशाजनक बढ़त को बस एक महीने का उलटफेर मान कर चलें, तो भी तमाम दूसरे क्षेत्रों में दरों के धीमे पड़ने के बारे में क्या कहें? इसके अलावा, जनवरी 2008 लगातार तीसरा ऐसा महीना साबित हुआ है, जब औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की दर 8% से कम रही है। सितंबर 2007 से ही यह नजर आ रहा है कि औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की दर कमजोर हो रही है।
अभी शायद यह निष्कर्ष निकालने का समय नहीं आया है कि भारत के विकास रथ का पहिया रुक गया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन को अब भी उम्मीद है कि इस कारोबारी साल में अर्थव्यवस्था
की विकास दर 8.5-9% के बीच रहेगी। लेकिन बाजार की असली चिंता आने वाले सालों को लेकर है। मूल्यांकनों का सारा गुणा-भाग 2008-09 और 2009-10 के अनुमानों पर टिका है।
राजीव रंजन झा
(शेयर बाजार का और हाल जानने के लिए पढ़े दैनिक ईमेल पत्रिका 'शेयर मंथन'। यह हिन्दी पत्रिका आपके लिए एकदम निःशुल्क है। अगर आप इस ईमेल पत्रिका को निःशुल्क प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप www.naradvani.com पर अपना नाम दर्ज करा सकते हैं।)

लोड हो रहा है...